Tuesday, January 13, 2015

अपने हाथों से खिलाए कौर

जब तुम आँटा गूँथ रही थी 
मैं गूँथ रहा था एक साज़िश 
पानी में । 

अपने हाथों से खिलाए कौर 
और रोता रहा । 

रात भर मैं तोड़ता रहा तुम्हें 
जैसे तोड़ी जाती है चट्टान । 

तुम्हारे होंठों से चुराया विष 
और घोल दिया जीवन में । 

वो आख़िरी रोटी 
आख़िरी पानी 
आख़िरी साँसे 
आख़िरी प्यार !

मेरे अंदर सदियों से एक नाम गूँज रहा था 
उसे मैंने लिख कर नहीं,मार कर मिटाया । 

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