और उस रात छत को ताँकते हुए
अपनी आँखों से छत पर तुम्हारा चेहरा बनाते हुए
मैं थूकता रहा तुम्हारी आँखों में रात भर
भेजता रहा लानतें
अंत में सारा थूक मुझ पर ही गिरा
सब लानतें मुझ पर ही आईं
क्यों नहीं मैंने करवट बदल ली
और छत के बजाय ज़मीन पर बनाया तुम्हारा चेहरा
मैं कभी क्यों करवट नहीं बदल पाया ?
No comments:
Post a Comment