Friday, January 09, 2015

मैं कभी क्यों करवट नहीं बदल पाया

और उस रात छत को ताँकते हुए 
अपनी आँखों से छत पर तुम्हारा चेहरा बनाते हुए 
मैं थूकता रहा तुम्हारी आँखों में रात भर 
भेजता रहा लानतें 

अंत में सारा थूक मुझ पर ही गिरा 
सब लानतें मुझ पर ही आईं 
क्यों नहीं मैंने करवट बदल ली 
और छत के बजाय ज़मीन पर बनाया तुम्हारा चेहरा 

मैं कभी क्यों करवट नहीं बदल पाया ?

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