Tuesday, January 13, 2015

अपने हाथों से खिलाए कौर

जब तुम आँटा गूँथ रही थी 
मैं गूँथ रहा था एक साज़िश 
पानी में । 

अपने हाथों से खिलाए कौर 
और रोता रहा । 

रात भर मैं तोड़ता रहा तुम्हें 
जैसे तोड़ी जाती है चट्टान । 

तुम्हारे होंठों से चुराया विष 
और घोल दिया जीवन में । 

वो आख़िरी रोटी 
आख़िरी पानी 
आख़िरी साँसे 
आख़िरी प्यार !

मेरे अंदर सदियों से एक नाम गूँज रहा था 
उसे मैंने लिख कर नहीं,मार कर मिटाया । 

Monday, January 12, 2015

मत थामो हाथ,मत लगाओ गले

सर्दियाँ जहाँ बर्फ़ थीं 
अँगीठी की आँच में सपने पकाए थे । 

सूरज उबलता था जब 
लम्बी दोपहरों की उबासियाँ टूटती थीं 
देहों में । 

पतझड़ में हुआ करती थी बारिश 
ऐसा सावन । 

याद है !

पृथ्वी सन्न पड़ी है जब से 
चुप्पी तुमने साधी है । 

तुतला कर बोलो 
रो कर बोलो 
हँस कर बोलो 
छू कर बोलो 
"हुँह कर बोलो"
मीठा बोलो,कड़वा बोलो 
कुछ सुन लो,कुछ कह लो 
डूबते हैं हम,बह लो 
पिस जाएगा,रिस जाएगा 
दर्द है थोड़ा सह लो । 

हम मात खाते-खाते 
पनाह माँगते जाते । 

मत थामो हाथ,मत लगाओ गले । 

मैं कुछ कहूँ तो 
एक बार और हँस दो बस 
मैं जी लूँ एक साल और । 

एक लड़की जिससे मैं टकराया था जीवन में

तुम्हारे पैरों में बहुत सारे सपने ला कर रखने थे मुझे 
मैं सपने चुराने निकला था । 

जितनी बार भी लौटो 
घर में वो घर नहीं मिलता जो छोड़ कर आये थे
हमारे अंदर से खाली हो जाते हैं घर 
कहाँ चले जाते हैं लोग ?

मैं बता कर निकला था कि लौटूंगा 
लौटा ज़रूर 
पर मैं नहीं 
मुझमे पता नहीं कौन आकर रहने लगा है । 

जो रह जाते हैं,जा नहीं पाते । 

और एक लड़की जिससे मैं टकराया था जीवन में 
साथ देते-देते जाने कहाँ गुम हो गई है । 

महीने और साल बीतते हैं,समय नहीं । 

मैंने नदी को बहते हुए देखा है 
उसने मुझे बार-बार किनारे पर ला कर छोड़ दिया । 
अब मेरे पास डूबने को समुन्दर है । 

और ठीक-ठीक तो नहीं पर मुझे याद है 
मैं सपने चुराने निकला हूँ । 

Sunday, January 11, 2015

यह शहर फूटेगा एक दिन

कितना कुछ ढूँढा जा रहा है 
इधर से उधर भागते फिरते हैं लोग 
पहुँचते हैं,
ऊबते हैं,
लौट आते हैं । 
नहीं पहुँचता कहीं तो बस मन !
इसने सिर्फ़ लौटना सीखा है । 

हर कोई ऐसे जूझता है अकेलेपन से जैसे 
खुद को ही शत्रु बना कर खड़ा कर लिया हो सामने 
और लड़ता रहे दिमाग़ के फट जाने तक 
खुद में कुछ नहीं मिलता तो बाहर जाना पड़ता है 
बाहर कुछ नहीं मिलता तो लौटना पड़ता है 
खुद से लेकिन कैसे लौटा जाए !

चुप्पी में छिपे होते हैं सबसे असरदार शब्द 
उन्हें समझ लेने वाले ही हैं सबसे निर्दयी लोग 
वे जान चुके हैं हमें पूरा और फिर भूल भी चुके हैं 
वे कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं करते बचाने के लिए । 
वे भी शायद इसी खेल में फँसे हैं 
वे भी सीखना चाहते होंगे खुद से लौटना ।

हम ढूँढ लाते हैं मायूसी 
उन्हीं के प्रति पालते हैं कटुता जो पूछते हैं हमें 
खुद से करते हैं नफ़रत ऐसा करने के लिए 
चुप रहते हैं घंटों 
सीख लेते हैं अभिनय 
चढ़ा लेते हैं ऐसी हँसी जो सबसे मुश्किल से हँसी जाती है 
फिर सब कुछ भूल कर घुल जाते हैं उन्हीं में एक बच्चे की तरह 
कोसते हैं खुद को कि क्यों हैं हम ऐसे । 

जहाँ से मिल सकता था सबसे ज़्यादा प्यार,वहाँ थोड़ा भी दे न पाए । 

इधर से उधर भागते फिर रहे हैं लोग 
ज़रा से सुकून के लिए। 
कोलाहल है 
यह शहर फूटेगा एक दिन ।  


Saturday, January 10, 2015

रुकते-रुकते फूट पड़ती थी हँसी

खिलौने थे हम अगर 
खेल था वह हमारा 

अदृश्य चाभी को पकड़े हुए सी मुद्रा में मेरी हथेली 
घूमती थी ठीक उसके होंठों के आगे 
और एक शर्त लगती थी कि नहीं हँसेगी वो 

रुकते-रुकते फूट पड़ती थी हँसी । 

यह कुछ ऐसा था कि बस 
मैं था ही नहीं उससे पहले 
मैं होऊँगा भी नहीं उसके बाद 
संसार भर की टिक-टिक रुकनी थी तो वहीं 

रात तुम्हें हँसते हुए देखा था 
सुबह से उधेड़बून में हूँ कि 
उकेर पाऊँ तुम्हारी हँसी से 
मिलने वाला सुक़ून । 

Friday, January 09, 2015

मैं कभी क्यों करवट नहीं बदल पाया

और उस रात छत को ताँकते हुए 
अपनी आँखों से छत पर तुम्हारा चेहरा बनाते हुए 
मैं थूकता रहा तुम्हारी आँखों में रात भर 
भेजता रहा लानतें 

अंत में सारा थूक मुझ पर ही गिरा 
सब लानतें मुझ पर ही आईं 
क्यों नहीं मैंने करवट बदल ली 
और छत के बजाय ज़मीन पर बनाया तुम्हारा चेहरा 

मैं कभी क्यों करवट नहीं बदल पाया ?

Wednesday, January 07, 2015

तुम्हारे जाने के बाद

1) तुम प्यार रचती हो मेरे इर्द-गिर्द 
    साज़िश की तरह 
    खुलती है वर्षों बाद  
    तहस-नहस होता हूँ समूचा 
    तुम्हारी आँखों के शून्य से । 

2) वे भी दिन होंगे 
    जब सिर्फ़ प्याज़ काटने से आएँगे आँसूं 
    थाम सकेंगे पानी को आँखों में,चलते रास्तों पर 
    अलमारी में छुपाई तस्वीरें देखकर हड़बड़ाएँगे नहीं 
    खुलते रहस्य की तरह भूलते जाएँगे तुम्हें 
    याद रखेंगे 
    बस प्यार । 

3) उन दिनों के बाद 
    आँसुओं ने छोड़ दिया होगा तुम्हारा साथ 
    मैं ले आया था सारे 
    मेरे होने से थे सब 
    तुम्हारे पास 
    किश्तों में चुकाता हूँ क़र्ज़ । 

4) तुमने मारा नहीं है मुझे,जन्म दिया है हर बार 
    जब लगा मुझे और लगवाया मैंने तुम्हें 
    कि मार रही हो तुम 
    यही है इकलौता सच 
    वह सारे बोध जो तुम्हें हुए,मुझे होने थे 
    तुमने बोया प्यार,मैंने डर । 

5) तुम्हारे जाने के बाद लम्बे समय तक 
    निचोड़ता रहा आँखें,कुरेदता रहा दिल 
    और यह बात मैं ख़बर की तरह नहीं 
    दुःख की तरह बताता हूँ । 

6) कैसे-कैसे जतन कर 
    कितनी मुश्किल से बचा कर रखा है प्यार 
    कब से सोच रखा है कि 
    जनवरी के महीने में लिखूँगा कोई अच्छी कविता 
    एक साल होने को है 
    तुमसे जुदा हुए ।