Thursday, March 20, 2014

एकतरफा फैसलों की वजह से

हम तलाश रहे थे अपना भविष्य
हमारे भी थे घर
हमारी भी थी माँ

दो लोग अगर अपना भविष्य
अपने सपने
साथ में देखते हैं
तो क्या ग़लत करते हैं ?

यह कैसे रिश्ते थे?

कभी हमें बुलाया जा रहा था
कभी हम मांग रहे थे थोड़ा सा समय
और किस से?
जीवन भर साथ रहने की बात करने वाली लड़कियाँ
तय कर रही थी हमारा भविष्य
सुना रही थी फ़ैसले
सहारा लिया जा रहा था
नारीवाद और आज़ादी जैसे शब्दों का

और हम नम आँखें लिए नाप रहे थे सड़कें
लौट रहे थे घर
एक एक करके सालों में संजोये
हर छोटे-छोटे पल में घुसे
हज़ारों सपने टूट रहे थे
बह रहे थे

हाँ हमें लौटाया जा रहा था
हमारे प्यार को दुत्कारा जा रहा था
हमसे झूठ बोले जा रहे थे
मगर हम इतने बेवकूफ थे कि
हमारी आँखों से उनका चेहरा नहीं उतर रहा था
उम्मीद नहीं जा रही थी

मैं कहता हूँ
हम सब को ऐसी हर उम्मीद को दफ्न करना चाहिए अब

सिर्फ एक एहसास के ख़त्म होने से
अगर सब ख़त्म हो जाता है
और कुछ मायने नहीं रखता
तो ऐसे एहसास का पूछा जाना चाहिए मतलब

होनी चाहिए भरपाई हमारे जीवन में आई
उथल पुथल की
ऐसे एकतरफा फैसलों की वजह से

और कितने ख़ूबसूरत चेहरे
यूँ जानवर बन जायेंगे |


Monday, February 24, 2014

किसी को अपने से अलग होने के लिए कहना

तुम आना
जब मैं भूल जाऊँगा इस दुनिया को  
मेरी उंगली पकड़ कर
मुझे ले जाना वापस
लोगों के बीच


जहां हर बड़ा आदमी
दूसरे बड़े आदमी को जानता है


जहां लोग बड़े बड़े फ़ैसले
झट से ले लेते हैं
देख पाते हैं अपना जीवन
साफ़-सुथरा दूर तलक


जहां तोड़ दिया जाता है
उन रिश्तों को
जिनका कोई नाम नहीं होता
जिनमे रहने के लिए कोई बाध्य नहीं होता
पर अलग होने के लिए होता है


किसी को अपने साथ रहने के लिए कहना
ज़बरदस्ती तो होती है
पर किसी को अपने से अलग होने के लिए कहना
कोई ज़बरदस्ती नहीं होती


और आपको चुपचाप ख़ामोशी से
बिना किसी तमाशे के
बस मान लेना होता है
क्योंकि ऐसे में भी निभाना होता है प्यार
उससे जो कह चुका है
कि उसे प्यार था अब नहीं है


कहाँ से सीखा तुमने 
किसी को यूं आत्मा में बसा लेना 
और केंचुल की तरह उतार फेंकना ।

Tuesday, February 04, 2014

वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी

जब बातें शुरू होने से पहले
ख़त्म होने लगी थीं
और सब कुछ भूल कर
लड़खड़ाते हाथों से भी लिखना था
कैसा होता है नकली होते चले जाना
कैसा होता होगा असली रूप में लौटना
और हर निर्णय मजबूरी रहा हो |

“उम्मीद” जितना घातक शब्द है
उतना ही सुंदर भी
और अगर याचना ही अंत है
तो तुमसे क्यों नहीं ?
मेरे पेट में ख़ंजर भोंका गया था
और मैं समझने की कोशिश में था
मुझे लाल रंग नहीं दिखा
आईना दिखा और दो चेहरे
मेरी आँखें बुझती गयीं
चेहरे चूमते रहे एक दूसरे को
इन चेहरों में झुर्रियां पड़नी थीं साथ-साथ
और हमें अतीत में भी जाना था
वही ख़ंजर पलट के मार देना था
पर मैं समझने की कोशिश में था
और वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी |

Friday, December 27, 2013

जो बच सकता है

जो आज था वही कल रहा है
वह मर गया जो फसल रहा है


सर्दियों में हाथ तापने बैठा था  
कैंप में एक बच्चा जल रहा है


आप रहते होंगे समाज में
वहाँ जंगल ही चल रहा है


सियासत में मरे हैं उनके भी
जिन बच्चों का गुल्ली-डंडा चल रहा है


कोई वापस स्कूल भेज दो उनको
देखो तो बचपन गल रहा है


आंकड़ों के खेल में इनके
जो बच सकता है वो टल रहा


इतिहास में झाँक कर देखो
सियासत का यही फल रहा है ।

Tuesday, December 24, 2013

किसी ने दिया था हर पल का वास्ता

क्या हवाओं में ही घुल गया है दर्द
आँखों को कोई और काम नहीं मिलता

लोग मिलते हैं यहाँ अय्यारों की तरह
बात करने को हमजाम नहीं मिलता

धूप-छाँव की तरह बदलता है मिज़ाज
भटकते ख्यालों को अंजाम नहीं मिलता

मुकम्मल जहां,ज़मीन,आसमान की बात छोड़ो
तबीयत पूछने को ख़ास-ए-आम नहीं मिलता

किसी ने दिया था हर पल का वास्ता
यूं ही तो कोई सुबह-शाम नहीं मिलता





Monday, December 23, 2013

जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

कर तो लोगे प्रेम 
निभाओगे कैसे ?
अपने ही पहरेदार बन कर बैठ जायेंगे 
तुम्हें बंद कमरों में पीटा जायेगा 
तुम्हारी ज़ात तय करेगी तुम्हारा भविष्य 
तुम्हारी जेब का भार तय करेगा तुम्हारी इज्ज़त 
तुम्हारे परम-पूज्य पिताश्री-माताश्री 
(मुख्यतः पिताश्री,माताएं अक्सर मूक होती हैं)
तय करेंगे की तमाम उम्र 
हर रात तुम्हें किसके सोना है 
उस कमरे के बाहर भले लोगों का समाज होगा
अंदर
एक जंगल होगा
ऐसे जंगल का तिरस्कार करोगे
तो कानून भी है तुम्हारे लिए
पेड़ की टहनी पर रस्सी का एक सिरा
दूसरा दो गलों में
घुटेगा दम
हवा में निर्जीव होंगे
चार पैर ....
और यह होगा जंगल का इन्साफ ...

समाज पनप रहा है जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

Sunday, December 22, 2013

ग़र रहते हम दोस्त

तुम हमारे घर आते हम तुम्हारे घर आते
ग़र रहते हम दोस्त तो मस्ती से जी पाते


इतनी सारी बंदिशें इश्क़ साथ लाएगा
ऐसी ग़ुलामी में बोलो कब तक जी पाते
न भटकना पड़ता यूं दूसरों के दर पर
खुद से इश्क़ करने का ग़र हुनर जान पाते


एक सिरा खुद लेकर दूसरा तुम्हें थमाया था
जितनी बार तुमने गिराया काश उतनी बार उठा पाते


प्यार के गीतों से फिर आँखें नम हुई हैं
तुम्हारे पास आने की छटपटाहट उम्र भर रोक पाते


ओ रहबरों एक बस्ती दिलजलों की बसा देते
भूल अपना "मैं" सब इश्क़ के किस्से सुना पाते