Thursday, January 15, 2015

कैफ़े कॉफी डे,ब्लैक फ़ॉरेस्ट और समुन्दर

बहुत सारी बातें एक साथ मुझे सोच रही थीं। जब समुन्दर मेरे सामने आ कर बैठ जाता है तो ऐसा ही होता है। उदासी बहुत सारा समुन्दर दे जाती है । 

वह बहुत पहले मुझे छोड़ कर जा चुकी थी। हमारे बीच अंडरस्टैंडिंग नहीं बन पाई थी। इसी में हमने तीन साल बिता दिए। मेरी आँखें और मेरा माथा उसे छोड़ नहीं पा रहे थे। जब समुन्दर मेरे सामने आ कर बैठ जाता था तो मुझे उसकी बहुत याद आती थी। माफ़ कीजिएगा,यह समुन्दर के बैठने वाली बात दोबारा लिख दी। माफ़ी माँगने में इसका ज़िक्र तीसरी बार भी हो गया। अगर हम अभी साथ होते तो मैं यहाँ आ कर उसे फ़ोन करता और मोबाइल को पानी के पास ले जा कर उसे लहरों की आवाज़ सुनाता। 

-नहीं आई आवाज़ !
-अब ?
-हाँ अब आई । 
-i miss you.
-i miss you too.
-मुझे यहाँ अकेले आना अच्छा नहीं लगता। 
-मुझे वहाँ आ कर तेरे साथ लहरों की आवाज़ सुननी है। 
-परेशान मत हो।कुछ समय बाद तो तू आ ही जाएगी। 
-हाँ। लेकिन तब तक तू इंतज़ार करेगा ना ?कोई और मत ढूँढ लेना। 
-मैं फँस गया हूँ तुझसे। अब कहीं नहीं जाऊँगा। 

फिर माफ़ी चाहूँगा। पुराने समय में लौट जाने की बुरी आदत है मुझे। दिमाग़ टाइम मशीन सा हो गया है। सूरज डूबने को था। सूरज डूबने का सीधा सम्बन्ध,और उदासी से है। अचानक से मुझे सब कुछ और ख़राब लगने लगा। मुझे याद आया कि अगले पाँच महीने तक तो कोई दिक्कत नहीं है,उसके बाद क्या होगा। मैं वापस घर चला जाऊँगा और दुनिया भर का साहित्य पढ़ूँगा और ईरानी,जर्मन,फ्रैंच,पोलिश,मेक्सिकन सारा सिनेमा देखूँगा। व्हाट्सऐप,फेसबुक सब बंद कर दूँगा और जैसे अभी मैं बात करने के लिए लोगों को ढूँढता रहता हूँ,तब सब मुझे ढूँढेंगे। मेरा मन किया कि पत्थरों से उतर जाऊँ और सीधा समुन्दर की ओर चलता चला जाऊँ। तभी पास से एक आवाज़ आई । 

-ग्याला 
-बाला 
-तेला  .......... 
एक छोटी सी बच्ची रेत पर उँगलियों से लकीरें खींचती हुई तुतलाती आवाज़ में गिनती बोल रही थी। 

वह बहुत प्यारी थी। मुझे लगा उसका नाम नेहा होगा। बहुत देर तक उसे देखता रहा और मुस्कुराता रहा। वह अपने दादा-दादी के साथ आई थी। दुनिया भर के दादाओं और दादियों के पास यही काम बचता है कि वे अपने बच्चों के बच्चों के साथ खूब खेलें। मुझे याद आया कि मैंने अपने दादा-दादी को नहीं देखा। मुझे घोर निराशा हुई कि इन रिश्तों को तो मैंने जीया ही नहीं। नेहा चली गई। 

मेरा फुटबॉल खेलने का मन हुआ। चूमने का भी। अँधेरा होने लगा था। उज्जवल भविष्य मेरी कामना करता हुआ वहाँ से चला आया। कैफ़े कॉफी डे के सामने से गुज़रा तो ब्लैक फ़ॉरेस्ट के एक कप में घुसी दो चम्मचें दिखने लगीं। होंठों ने उँगलियों को अपनी ओर खींचा और मैं आगे बढ़ गया । 

घंटों कमरे में बंद पड़े रहना

जो आसान था,
वही सबसे मुश्किल था 
मुश्किल था एक बार बाहर निकला जाना । 

बाहर 
ठंडी हवा थी,
कुत्ते थे,
पेट भर खाना था
बाहर दीवारें नहीं थी । 

मैं तुम्हारे साथ पड़ा रहना चाहता था 
तुम मेरे अंदर थीं । 

तुम एक छवि हो 
जो तुमने ही मेरी आँखों में बुनी है । 

पार्श्व में सुनाई देती 
"ना तुम हमें जानो,ना हम तुम्हें जानें"
की धुन 
और 
घंटों कमरे में बंद पड़े रहना । 

Tuesday, January 13, 2015

अपने हाथों से खिलाए कौर

जब तुम आँटा गूँथ रही थी 
मैं गूँथ रहा था एक साज़िश 
पानी में । 

अपने हाथों से खिलाए कौर 
और रोता रहा । 

रात भर मैं तोड़ता रहा तुम्हें 
जैसे तोड़ी जाती है चट्टान । 

तुम्हारे होंठों से चुराया विष 
और घोल दिया जीवन में । 

वो आख़िरी रोटी 
आख़िरी पानी 
आख़िरी साँसे 
आख़िरी प्यार !

मेरे अंदर सदियों से एक नाम गूँज रहा था 
उसे मैंने लिख कर नहीं,मार कर मिटाया । 

Monday, January 12, 2015

मत थामो हाथ,मत लगाओ गले

सर्दियाँ जहाँ बर्फ़ थीं 
अँगीठी की आँच में सपने पकाए थे । 

सूरज उबलता था जब 
लम्बी दोपहरों की उबासियाँ टूटती थीं 
देहों में । 

पतझड़ में हुआ करती थी बारिश 
ऐसा सावन । 

याद है !

पृथ्वी सन्न पड़ी है जब से 
चुप्पी तुमने साधी है । 

तुतला कर बोलो 
रो कर बोलो 
हँस कर बोलो 
छू कर बोलो 
"हुँह कर बोलो"
मीठा बोलो,कड़वा बोलो 
कुछ सुन लो,कुछ कह लो 
डूबते हैं हम,बह लो 
पिस जाएगा,रिस जाएगा 
दर्द है थोड़ा सह लो । 

हम मात खाते-खाते 
पनाह माँगते जाते । 

मत थामो हाथ,मत लगाओ गले । 

मैं कुछ कहूँ तो 
एक बार और हँस दो बस 
मैं जी लूँ एक साल और । 

एक लड़की जिससे मैं टकराया था जीवन में

तुम्हारे पैरों में बहुत सारे सपने ला कर रखने थे मुझे 
मैं सपने चुराने निकला था । 

जितनी बार भी लौटो 
घर में वो घर नहीं मिलता जो छोड़ कर आये थे
हमारे अंदर से खाली हो जाते हैं घर 
कहाँ चले जाते हैं लोग ?

मैं बता कर निकला था कि लौटूंगा 
लौटा ज़रूर 
पर मैं नहीं 
मुझमे पता नहीं कौन आकर रहने लगा है । 

जो रह जाते हैं,जा नहीं पाते । 

और एक लड़की जिससे मैं टकराया था जीवन में 
साथ देते-देते जाने कहाँ गुम हो गई है । 

महीने और साल बीतते हैं,समय नहीं । 

मैंने नदी को बहते हुए देखा है 
उसने मुझे बार-बार किनारे पर ला कर छोड़ दिया । 
अब मेरे पास डूबने को समुन्दर है । 

और ठीक-ठीक तो नहीं पर मुझे याद है 
मैं सपने चुराने निकला हूँ । 

Sunday, January 11, 2015

यह शहर फूटेगा एक दिन

कितना कुछ ढूँढा जा रहा है 
इधर से उधर भागते फिरते हैं लोग 
पहुँचते हैं,
ऊबते हैं,
लौट आते हैं । 
नहीं पहुँचता कहीं तो बस मन !
इसने सिर्फ़ लौटना सीखा है । 

हर कोई ऐसे जूझता है अकेलेपन से जैसे 
खुद को ही शत्रु बना कर खड़ा कर लिया हो सामने 
और लड़ता रहे दिमाग़ के फट जाने तक 
खुद में कुछ नहीं मिलता तो बाहर जाना पड़ता है 
बाहर कुछ नहीं मिलता तो लौटना पड़ता है 
खुद से लेकिन कैसे लौटा जाए !

चुप्पी में छिपे होते हैं सबसे असरदार शब्द 
उन्हें समझ लेने वाले ही हैं सबसे निर्दयी लोग 
वे जान चुके हैं हमें पूरा और फिर भूल भी चुके हैं 
वे कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं करते बचाने के लिए । 
वे भी शायद इसी खेल में फँसे हैं 
वे भी सीखना चाहते होंगे खुद से लौटना ।

हम ढूँढ लाते हैं मायूसी 
उन्हीं के प्रति पालते हैं कटुता जो पूछते हैं हमें 
खुद से करते हैं नफ़रत ऐसा करने के लिए 
चुप रहते हैं घंटों 
सीख लेते हैं अभिनय 
चढ़ा लेते हैं ऐसी हँसी जो सबसे मुश्किल से हँसी जाती है 
फिर सब कुछ भूल कर घुल जाते हैं उन्हीं में एक बच्चे की तरह 
कोसते हैं खुद को कि क्यों हैं हम ऐसे । 

जहाँ से मिल सकता था सबसे ज़्यादा प्यार,वहाँ थोड़ा भी दे न पाए । 

इधर से उधर भागते फिर रहे हैं लोग 
ज़रा से सुकून के लिए। 
कोलाहल है 
यह शहर फूटेगा एक दिन ।  


Saturday, January 10, 2015

रुकते-रुकते फूट पड़ती थी हँसी

खिलौने थे हम अगर 
खेल था वह हमारा 

अदृश्य चाभी को पकड़े हुए सी मुद्रा में मेरी हथेली 
घूमती थी ठीक उसके होंठों के आगे 
और एक शर्त लगती थी कि नहीं हँसेगी वो 

रुकते-रुकते फूट पड़ती थी हँसी । 

यह कुछ ऐसा था कि बस 
मैं था ही नहीं उससे पहले 
मैं होऊँगा भी नहीं उसके बाद 
संसार भर की टिक-टिक रुकनी थी तो वहीं 

रात तुम्हें हँसते हुए देखा था 
सुबह से उधेड़बून में हूँ कि 
उकेर पाऊँ तुम्हारी हँसी से 
मिलने वाला सुक़ून ।