Tuesday, February 04, 2014

वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी

जब बातें शुरू होने से पहले
ख़त्म होने लगी थीं
और सब कुछ भूल कर
लड़खड़ाते हाथों से भी लिखना था
कैसा होता है नकली होते चले जाना
कैसा होता होगा असली रूप में लौटना
और हर निर्णय मजबूरी रहा हो |

“उम्मीद” जितना घातक शब्द है
उतना ही सुंदर भी
और अगर याचना ही अंत है
तो तुमसे क्यों नहीं ?
मेरे पेट में ख़ंजर भोंका गया था
और मैं समझने की कोशिश में था
मुझे लाल रंग नहीं दिखा
आईना दिखा और दो चेहरे
मेरी आँखें बुझती गयीं
चेहरे चूमते रहे एक दूसरे को
इन चेहरों में झुर्रियां पड़नी थीं साथ-साथ
और हमें अतीत में भी जाना था
वही ख़ंजर पलट के मार देना था
पर मैं समझने की कोशिश में था
और वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी |

Friday, December 27, 2013

जो बच सकता है

जो आज था वही कल रहा है
वह मर गया जो फसल रहा है


सर्दियों में हाथ तापने बैठा था  
कैंप में एक बच्चा जल रहा है


आप रहते होंगे समाज में
वहाँ जंगल ही चल रहा है


सियासत में मरे हैं उनके भी
जिन बच्चों का गुल्ली-डंडा चल रहा है


कोई वापस स्कूल भेज दो उनको
देखो तो बचपन गल रहा है


आंकड़ों के खेल में इनके
जो बच सकता है वो टल रहा


इतिहास में झाँक कर देखो
सियासत का यही फल रहा है ।

Tuesday, December 24, 2013

किसी ने दिया था हर पल का वास्ता

क्या हवाओं में ही घुल गया है दर्द
आँखों को कोई और काम नहीं मिलता

लोग मिलते हैं यहाँ अय्यारों की तरह
बात करने को हमजाम नहीं मिलता

धूप-छाँव की तरह बदलता है मिज़ाज
भटकते ख्यालों को अंजाम नहीं मिलता

मुकम्मल जहां,ज़मीन,आसमान की बात छोड़ो
तबीयत पूछने को ख़ास-ए-आम नहीं मिलता

किसी ने दिया था हर पल का वास्ता
यूं ही तो कोई सुबह-शाम नहीं मिलता





Monday, December 23, 2013

जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

कर तो लोगे प्रेम 
निभाओगे कैसे ?
अपने ही पहरेदार बन कर बैठ जायेंगे 
तुम्हें बंद कमरों में पीटा जायेगा 
तुम्हारी ज़ात तय करेगी तुम्हारा भविष्य 
तुम्हारी जेब का भार तय करेगा तुम्हारी इज्ज़त 
तुम्हारे परम-पूज्य पिताश्री-माताश्री 
(मुख्यतः पिताश्री,माताएं अक्सर मूक होती हैं)
तय करेंगे की तमाम उम्र 
हर रात तुम्हें किसके सोना है 
उस कमरे के बाहर भले लोगों का समाज होगा
अंदर
एक जंगल होगा
ऐसे जंगल का तिरस्कार करोगे
तो कानून भी है तुम्हारे लिए
पेड़ की टहनी पर रस्सी का एक सिरा
दूसरा दो गलों में
घुटेगा दम
हवा में निर्जीव होंगे
चार पैर ....
और यह होगा जंगल का इन्साफ ...

समाज पनप रहा है जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

Sunday, December 22, 2013

ग़र रहते हम दोस्त

तुम हमारे घर आते हम तुम्हारे घर आते
ग़र रहते हम दोस्त तो मस्ती से जी पाते


इतनी सारी बंदिशें इश्क़ साथ लाएगा
ऐसी ग़ुलामी में बोलो कब तक जी पाते
न भटकना पड़ता यूं दूसरों के दर पर
खुद से इश्क़ करने का ग़र हुनर जान पाते


एक सिरा खुद लेकर दूसरा तुम्हें थमाया था
जितनी बार तुमने गिराया काश उतनी बार उठा पाते


प्यार के गीतों से फिर आँखें नम हुई हैं
तुम्हारे पास आने की छटपटाहट उम्र भर रोक पाते


ओ रहबरों एक बस्ती दिलजलों की बसा देते
भूल अपना "मैं" सब इश्क़ के किस्से सुना पाते


Friday, December 20, 2013

मैं रेगिस्तान में मरूँगा

जब लौट कर जाना ऐसा हो जायेगा
जैसा वर्जित होना होता है
जैसे घर हो जाते हैं
माँ वहीँ रहती है
जैसे प्रेमी हो जाते हैं
हर बात पे झगड़े के बाद या  
लम्बी चुप्पी के बाद
अगर तब लौटे ?
कायरता और धैर्य को
एक तराजू में तौला जायेगा क्या ?
प्यार और कमज़ोरी को भी ?
समझ धोखा दे ही देती है
कोई पीछे भागता है
कोई स्थिति से
अगर है कुछ मन में
तो झाँका जाना चाहिए मन में
इतने प्यारे लोग निर्दयी क्या सच में होते हैं ?
अनकही बातों का अपराध-बोध
मुझे भी छीलता है
कसौटी पर मुझे खरा उतरना था
तुम्हें क्यों नहीं ?
तुमने भी किया था
तुम्हें भी मारेगा ...

और मैंने अपने मरने की जगह
चुन ली है
मैं मरूँगा वहाँ जहां
आस होगी
प्यास होगी
रेत होगी
जहां रेगिस्तान होगा
हाँ मैं रेगिस्तान में मरूँगा
सुनो
किसी एक साल तुम्हें झमाझम बरसना होगा

लोग कहते हैं
रेगिस्तान में बारिश नहीं होती |

Saturday, December 14, 2013

हारो मत

आओ,देखो
मेरे पास बैठो
देखो मुझे
मेरे चेहरे को
मेरी आँखों को
पहचानो
मेरी आस को
मेरी प्यास को
तुम्हारे पास ही हल है
झंझटों से ऊपर उठो
यह आज हैं कल नहीं रहेंगी
सब कुछ हमारे ही हाथ में है
समय कहीं निकल न जाए
मैं मर न जाऊं
किस फेरे में पड़ी हो
क्या सोच रही हो
सही-ग़लत
खोया-पाया
मिला-किया
यह आंकलन कहीं तो जाके रुके
दिल,मन ,एहसास ,प्यार सब मायने रखता है
इंसान भी तो मायने रखता है
जीवन भी तो मायने रखता है
लड़ो सही बात के लिए
हारो मत

मत हारो ।