Tuesday, May 13, 2014

तुम मुझे यूं मार कर गिरा दोगी

और मुझे एकदम से याद आया
   जबकि मैं कुछ सोचना नहीं चाह रहा था
   मैं अब कुछ सोचना नहीं चाहता
   कि मेरे पास मेरे बचपन की एक ही फ़ोटो थी
   और मैं उसमें ऐसा सीधा दिखता था कि
   तुम मुझे यूं मार कर गिरा दोगी
   तुम अपनी बचपन की फ़ोटो में भी
   बहुत चंट दिखती थीं
   मार कर गिरा देने वाली बात
   तुमने ही तो कही थी
   इस बात पर हम कुछ देर हँसते रहे थे
   मुझे वह दोनों फ़ोटो याद आती हैं
   और एक पर्स भी  
   अब मैं कुछ सोचना नहीं चाहता
   लेकिन तब
   मैं अपने और तुम्हारे बचपन में लौट जाना चाहता था
   तुम्हारे साथ बड़ा होना चाहता था
   उस घर जाना चाहता था
   जहां तुम बार बार अकेली चली जाती हो
   तुम्हारे साथ स्कूल जाना चाहता था
   पैदल चलते हुए आगे निकल कर,रुक कर,पीछे मुड़ कर
   तुम्हारा इंतज़ार करना चाहता था

   तुम्हें तो याद होंगे वह रास्ते
   मैंने तो कभी देखे ही नहीं
   तुम्हें अपने घर ले जाना चाहता था
   जिधर जाने वाली ट्रेन में तुम मुझे छोड़ने स्टेशन तक आती थी
   हम दोनों दूर तक पटरियों पर नज़र दौड़ाते थे
   मुझे दिखता था मेरा घर
   तुम्हें मेरा बीता हुआ समय

  कितना समय निकल गया था
  जो हमने साथ नहीं बिताया था
  कितना समय आना बाकी है
  जो हमें साथ बिताना था  
  वो फोटोज़ बड़ी हो गयीं हैं
  बूढ़ी भी तो होंगी
  पर अब उनकी कोई बात नहीं होती |

2 comments:

  1. मैंने इससे अच्छा दोस्ती और प्यार का दस्तावेज़ नहीं पढ़ा। देखा है। जिया है। पर पढ़ा नहीं।

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  2. बेहतरीन लिखते हैं आप।

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