मैं बिल्कुल नहीं कहना चाहता कि उनकी आँखें नहीं हैं
पर यह सच है कि वो देख नहीं सकते
और जो देख सकते हैं वो इतना देख चुके हैं कि हार कर
अपनी नज़र की हत्या कर चुके हैं ।
ऐसा करना उनकी ख़ुद को ज़िंदा रख पाने की जद्दोज़हद है बस ।
और यक़ीन मानिए
मैं जिन फेरों में फँसा हूँ
खुद एक चक्रव्यूह हो गया हूँ
जिसे मैंने रचा और फँसकर रह गया
इसकी साँकलें तोड़कर जब मैं बाहर निकलूँगा
तब ख़ुद भी भूल जाऊँगा अपने जैसों को और
दंभ में कहूँगा कि हाँ मुझे कुछ नहीं दिखता
मुझे अब चैन से जी लेने दो ।
यह जो एक दीवार मेरे माथे और
मेरी आँखों में बन गई है
जिससे मैं बाहर का कुछ देख नहीं पाता
और अंदर पूरी एक इबारत लिखी है उलझे अतीत की
कब तोड़ पाऊँगा इसे ऐसा खुद को कोसते
मैं अपने इंतज़ार में हूँ ।
मैं अपने इंतज़ार में हूँ कि लौटूँगा
तुम्हारे पास नहीं
इस बार एक दफ़ा ख़ुद के पास ।
यह दीवार जिसका मैंने अभी ऊपर ज़िक्र किया
जिसे मैं तोड़ना चाहता हूँ
इस पर कभी किसी ने अपने हाथों से पोता था प्यार
और जहाँ दीवार की आँख थी वहाँ चूमा था बारी-बारी
पहले बायीं फिर दायीं या शायद ....
हाँ इसी क्रम में ।
जी हाँ दीवार की आँख थी जो बहती भी थी ।
रँग पपड़ी-पपड़ी कर के उतरता है
मैं भी रोज़ कुरेदता हूँ
नाख़ून दाँतों से ही चबाता हूँ
बड़े हो नहीं पाते
दीवार पर नया रँग पोतता हूँ
काला ।
बचपन में आँगन में लगा अमरूद का पेड़
अमरूद कम और मधुमक्खी के छत्ते ज़्यादा उगाने लगाने था
माफ़ कीजिए
मधुमक्खी नहीं ततैया
पीली-पीली ।
गले में फँस कर रह गया है नाम
आँखों में धँस कर रह गया है चेहरा
माथे में गढ़ गई हैं आँखें
तुम्हारी ।
मेरी स्मृति पर ऐसा कब्ज़ा किया गया है
जैसा दिल्ली पर कितनी बार किया था
तुर्कों,अफ़ग़ानों और मुग़लों ने
और छोड़ दिया था लुटा-पिटा ।
मेरी आँखें अभी हैं क्योंकि मैं भोग रहा हूँ
कब तक रहेंगी पता नहीं
पर एक अपील उन सबसे जो देख नहीं पा रहे !
बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में
कई लोगों ने सीखा है
ख़ुद से बातें करना,बड़बड़ाना और पागल हो जाना
चिल्लाना,उदास रहना,हिंसक हो जाना
दवाईयाँ गटक कर झेलना अवसाद
या बस
कूद जाना छतों से,खिड़कियों से, बालकनियों से ।
सबसे तेज़ चिल्ला वही रहा है जो घुट रहा है
जो बहुत ज़्यादा सो रहा है वो उठ रहा है
इन्हें भी ले जाइए अपनी रंगीनियों में
घबराते है जो साँस के हर उतार-चढ़ाव के साथ ।
खोलिए ना आँखें !
अकेलापन मार रहा है कितनों को
वे बच गए तभी बोल पाएँगे ।
मैं अपनी आँखें बचा रहा हूँ
आप भी बचाइए ।
पर यह सच है कि वो देख नहीं सकते
और जो देख सकते हैं वो इतना देख चुके हैं कि हार कर
अपनी नज़र की हत्या कर चुके हैं ।
ऐसा करना उनकी ख़ुद को ज़िंदा रख पाने की जद्दोज़हद है बस ।
और यक़ीन मानिए
मैं जिन फेरों में फँसा हूँ
खुद एक चक्रव्यूह हो गया हूँ
जिसे मैंने रचा और फँसकर रह गया
इसकी साँकलें तोड़कर जब मैं बाहर निकलूँगा
तब ख़ुद भी भूल जाऊँगा अपने जैसों को और
दंभ में कहूँगा कि हाँ मुझे कुछ नहीं दिखता
मुझे अब चैन से जी लेने दो ।
यह जो एक दीवार मेरे माथे और
मेरी आँखों में बन गई है
जिससे मैं बाहर का कुछ देख नहीं पाता
और अंदर पूरी एक इबारत लिखी है उलझे अतीत की
कब तोड़ पाऊँगा इसे ऐसा खुद को कोसते
मैं अपने इंतज़ार में हूँ ।
मैं अपने इंतज़ार में हूँ कि लौटूँगा
तुम्हारे पास नहीं
इस बार एक दफ़ा ख़ुद के पास ।
यह दीवार जिसका मैंने अभी ऊपर ज़िक्र किया
जिसे मैं तोड़ना चाहता हूँ
इस पर कभी किसी ने अपने हाथों से पोता था प्यार
और जहाँ दीवार की आँख थी वहाँ चूमा था बारी-बारी
पहले बायीं फिर दायीं या शायद ....
हाँ इसी क्रम में ।
जी हाँ दीवार की आँख थी जो बहती भी थी ।
रँग पपड़ी-पपड़ी कर के उतरता है
मैं भी रोज़ कुरेदता हूँ
नाख़ून दाँतों से ही चबाता हूँ
बड़े हो नहीं पाते
दीवार पर नया रँग पोतता हूँ
काला ।
बचपन में आँगन में लगा अमरूद का पेड़
अमरूद कम और मधुमक्खी के छत्ते ज़्यादा उगाने लगाने था
माफ़ कीजिए
मधुमक्खी नहीं ततैया
पीली-पीली ।
गले में फँस कर रह गया है नाम
आँखों में धँस कर रह गया है चेहरा
माथे में गढ़ गई हैं आँखें
तुम्हारी ।
मेरी स्मृति पर ऐसा कब्ज़ा किया गया है
जैसा दिल्ली पर कितनी बार किया था
तुर्कों,अफ़ग़ानों और मुग़लों ने
और छोड़ दिया था लुटा-पिटा ।
मेरी आँखें अभी हैं क्योंकि मैं भोग रहा हूँ
कब तक रहेंगी पता नहीं
पर एक अपील उन सबसे जो देख नहीं पा रहे !
बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में
कई लोगों ने सीखा है
ख़ुद से बातें करना,बड़बड़ाना और पागल हो जाना
चिल्लाना,उदास रहना,हिंसक हो जाना
दवाईयाँ गटक कर झेलना अवसाद
या बस
कूद जाना छतों से,खिड़कियों से, बालकनियों से ।
सबसे तेज़ चिल्ला वही रहा है जो घुट रहा है
जो बहुत ज़्यादा सो रहा है वो उठ रहा है
इन्हें भी ले जाइए अपनी रंगीनियों में
घबराते है जो साँस के हर उतार-चढ़ाव के साथ ।
खोलिए ना आँखें !
अकेलापन मार रहा है कितनों को
वे बच गए तभी बोल पाएँगे ।
मैं अपनी आँखें बचा रहा हूँ
आप भी बचाइए ।