Sunday, June 07, 2015

बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में

मैं बिल्कुल नहीं कहना चाहता कि उनकी आँखें नहीं हैं 
पर यह सच है कि वो देख नहीं सकते 
और जो देख सकते हैं वो इतना देख चुके हैं कि हार कर 
अपनी नज़र की हत्या कर चुके हैं । 
ऐसा करना उनकी ख़ुद को ज़िंदा रख पाने की जद्दोज़हद है बस । 

और यक़ीन मानिए 
मैं जिन फेरों में फँसा हूँ 
खुद एक चक्रव्यूह हो गया हूँ 
जिसे मैंने रचा और फँसकर रह गया 
इसकी साँकलें तोड़कर जब मैं बाहर निकलूँगा 
तब ख़ुद भी भूल जाऊँगा अपने जैसों को और 
दंभ में कहूँगा कि हाँ मुझे कुछ नहीं दिखता 
मुझे अब चैन से जी लेने दो । 

यह जो एक दीवार मेरे माथे और 
मेरी आँखों में बन गई है 
जिससे मैं बाहर का कुछ देख नहीं पाता 
और अंदर पूरी एक इबारत लिखी है उलझे अतीत की 
कब तोड़ पाऊँगा इसे ऐसा खुद को कोसते 
मैं अपने इंतज़ार में हूँ । 

मैं अपने इंतज़ार में हूँ कि लौटूँगा 
तुम्हारे पास नहीं 
इस बार एक दफ़ा ख़ुद के पास । 

यह दीवार जिसका मैंने अभी ऊपर ज़िक्र किया 
जिसे मैं तोड़ना चाहता हूँ 
इस पर कभी किसी ने अपने हाथों से पोता था प्यार 
और जहाँ दीवार की आँख थी वहाँ चूमा था बारी-बारी 
पहले बायीं फिर दायीं या शायद ....
हाँ इसी क्रम में । 
जी हाँ दीवार की आँख थी जो बहती भी थी । 

रँग पपड़ी-पपड़ी कर के उतरता है 
मैं भी रोज़ कुरेदता हूँ 
नाख़ून दाँतों से ही चबाता हूँ 
बड़े हो नहीं पाते 
दीवार पर नया रँग पोतता हूँ 
काला । 

बचपन में आँगन में लगा अमरूद का पेड़ 
अमरूद कम और मधुमक्खी के छत्ते ज़्यादा उगाने लगाने था 
माफ़ कीजिए 
मधुमक्खी नहीं ततैया 
पीली-पीली । 

गले में फँस कर रह गया है नाम 
आँखों में धँस कर रह गया है चेहरा 
माथे में गढ़ गई हैं आँखें 
तुम्हारी । 
मेरी स्मृति पर ऐसा कब्ज़ा किया गया है 
जैसा दिल्ली पर कितनी बार किया था 
तुर्कों,अफ़ग़ानों और मुग़लों ने 
और छोड़ दिया था लुटा-पिटा । 

मेरी आँखें अभी हैं क्योंकि मैं भोग रहा हूँ 
कब तक रहेंगी पता नहीं 
पर एक अपील उन सबसे जो देख नहीं पा रहे !

बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में 
कई लोगों ने सीखा है 
ख़ुद से बातें करना,बड़बड़ाना और पागल हो जाना 
चिल्लाना,उदास रहना,हिंसक हो जाना 
दवाईयाँ गटक कर झेलना अवसाद 
या बस 
कूद जाना छतों से,खिड़कियों से, बालकनियों से । 

सबसे तेज़ चिल्ला वही रहा है जो घुट रहा है 
जो बहुत ज़्यादा सो रहा है वो उठ रहा है 
इन्हें भी ले जाइए अपनी रंगीनियों में 
घबराते है जो साँस के हर उतार-चढ़ाव के साथ । 

खोलिए ना आँखें !
अकेलापन मार रहा है कितनों को 
वे बच गए तभी बोल पाएँगे । 

मैं अपनी आँखें बचा रहा हूँ 
आप भी बचाइए ।  

Thursday, June 04, 2015

एक बहुत यातना वाले दिन

कैसा प्रेम था ?
विवशता !

पहले प्रेम में पड़ने की विवशता 
तुम्हारे कहने पर 
फिर उससे बाहर गिरने की 
तुम्हारे ही कहने पर । 

रात होती थी और 
रोज़ उनके सधे मानकों पर खरा उतरना होता था 
वे उकसाएँ और उन्माद में उन्हें नोच खाने के बजाय 
मन मसोस कर उनके भड़कते दिल की तासीर को 
समझदारी से ठंडा कर दूँ 
तो मेरी जीत 
बताया जाए किसी बहुत हँसी वाले दिन 
यह तो कसौटी थी 
तुम उत्तीर्ण हुए 
लायक हो प्रेम के । 

हम आज़माने के लिए थे 
छले गए अच्छे । 

दीवारों से लिपट कर रोते 
और चाटते कागज़ प्यार के 
खुरचते ज़मीन पर बिछी रंगीनियाँ । 

भर लाए हैं नाखूनों में 
रँग सारा 
रोज़ चबाते थोड़ा-थोड़ा कर के । 

तुम्हारे एक बार नकारने से चले आते 
चुप-चाप 
जैसा तय किया था 
एक बहुत यातना वाले दिन । 

Tuesday, May 26, 2015

हम खुद को बचाते हैं

वे सब 
जिनसे हम प्यार में है 
ग़लतफ़हमियों के शिक़ार होते जाते हैं 
एक-एक बात 
नुकीली कील-सी ठोकते हैं दिमाग़ में 
भरते जाते हैं अपनी कुंठाओं का नीला रँग 
उनके सीने में 
लिपटते हैं,फिर उन्हीं से बचते हैं 
फिर उन्हीं को नोचते हैं । 

कैसे-कैसे 
हम खुद को बचाते हैं । 

Thursday, May 21, 2015

किस किसका फ़ोन उठाते हैं आप ?

आपको तैयार रहना चाहिए ना 
हर किसी के स्वागत के लिए 
कि घंटी बजे और आप मुस्कुराएँ 
सब भूल कर साथ बैठें और पीएँ अदरक वाली चाय 
फिर चाहे 
वे सीधे छाती पर चढ़ आते हों 
माथे को लाल सन्न कर जाते हों 
कौन सी बात को क्या रूप दे कर 
किस तरह बताते हों । 

आप लोगों से मिलने में इतना क्यों घबराते हो । 

कहाँ आप सहज हो 
कहाँ से भाग जाना चाहते हो 
कहाँ आप सिर्फ़ सुनते हो 
कहाँ थोड़ा बोल भी पाते हो !

कितने पाले हैं आस्तीन में साँप ! 

किस किसका फ़ोन उठाते हैं आप ?

Monday, May 18, 2015

काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा

फिर एक समय आता है 
जब आप माँग नहीं सकते 
दे भी नहीं पाते 
तब 
सिखाना पड़ता है खुद ही खुद को पालना 
लम्बी साँसें भर कर गले में उतारना पड़ता है सारा तेज़ाब 
फेँक देना होता है खुद को उदासी वाले किसी देश में 
कोई अपनी आँखें 
अपनी ममता ले कर 
नहीं पहुँच पाए जहाँ तक 
सीने से उठते सब शब्द सिर को हौले हौले करते हैं ज़ख्मी । 

काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा । 

कितना चाहा होगा ना आपने कि साथ रहें 
जो चाहा वही तो नहीं मिला बस 
बाक़ी तो कितना हँसते हैं हम ।  

Saturday, May 09, 2015

एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम

सर्द होती संवेदनाओं के नाम 
इस शाम 
देता हूँ पैग़ाम 
कहीं बहुत दूर से आती 
कानों में पड़ती है एक हँसी 
किसकी !
क्या जानूँ ?
एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम । 

माज़ी की सारी परतें चीरते हुए 
तुम तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ 
सफल।
ग़ायब होती जाती हो हर जगह से 
जबरन गिराई गई एक इमारत की तरह 
ध्वस्त होते हैं सब रास्ते 
जिन पर चले थे चार पैर साथ 
और उँगलियाँ गुँथे दो हाथ । 

बुझ चुकी लौ के नाम 
रौशनी बिन 
लौ और दीये 
दोनों का क्या दाम !

अब अँधेरा घिरता आता है यहाँ 
खिड़की में छिपे समुन्दर से 
जाओ !
तुम्हारे जाने का समय है । 



Tuesday, May 05, 2015

तू आग देती रहना

सन्नाटा चुभता है कानों में 
बालियाँ भी 

रात है अँधेरा यहाँ 
उजाला भी 

नल खुला है 
आवाज़ है 
डर गिरता है बाल्टी में 
पीता भी हूँ 
नहाता भी 

मेरी एक दुनिया है 
तुझसे भरी 
तुझसे फ़ना 

ठंडक है 
तू आग देती रहना ।