Friday, February 20, 2015

एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान

मुझे दो दृश्य याद आते हैं 

किसी गाँव में कहीं तुम जीने पर खड़ी हो 
मूँह फुलाए ग़ुस्से में,
मैं कहीं बाहर से इंतज़ार में हूँ 

फिर एक छत है 
हम घुट रहे हैं 
और बेशर्म चाँद की रौशनी में 
पैदा कर रहे हैं आग । 

झुलसाएगी बहुत गर पैदा हुई आग 
तुम्हारी आँखों में जला देगी मेरा चेहरा 
पहचानने से करोगी इंकार 
मैं चुनूँगा प्यार 
एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान । 

हम जब अपना पागल होना बचा रहे थे माँ 
एक लड़की बार-बार दिमाग़ पे चोट कर के चली जाती थी । 

Saturday, January 24, 2015

वे कभी नहीं आते

-अब तक क्यों रुके थे ?
-वे नहीं आएँगे । 
-वे कभी नहीं आते । 
-अब मुझे भी ऐसा लगता है । 
-तुम्हें बहुत पहले चले जाना चाहिए था । 
-पर वे आ जाते तो ?
-तब भी ऐसा कुछ नहीं बदलता । 
-कभी कुछ नहीं बदलता । 
-वे तुम्हें ढूँढ़ते हुए आए तो ?
-कहना मैं निकल गया । पर इस तरह मत बोलो । मेरा रुकने का मन होने लगा । 
-तुम्हें बहुत पहले चले जाना चाहिए था । 
-पर वे आ जाते तो ?
-अब जाओ । 
-वे ढूँढने आएं तो मुझे ख़बर मत करना । या तो कर देना । नहीं ! मत करना । 
-वे नहीं आएँगे । 
-मैं जानता हूँ । 
-वे कभी नहीं आते । 
-तुम साथ चलोगी ?

Sunday, January 18, 2015

कितना भिगो दिया है तुमने अपने स्त्रित्व से

एक कमी है 
बहुत चुभती है 
नहीं ! तुम्हारी नहीं !
तुम तो हो और रहोगी । 

जो जब होता है
जितना होता है,तब ही 
उसे उतना महसूस लेते 
बाद में इतना क्यों रब्बा !

इतने ज़रा से समय में जो दे गई हो 
वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा कर के और बढ़ता जाता है । 
तुम्हें बता पाता 
कितना भिगो दिया है तुमने अपने स्त्रित्व से । 

कहीं किसी टूटी या उलझी डोर का कोई सिरा फिर मिलेगा 
और गुंध जाऊँगा उसमें 
तुम्हें साथ ले कर ।

और ऐसा सब कहते हुए आँख से एक भी आँसू नहीं गिरता पगली 
सच 
क़सम से,
तेरी याद भी नहीं आती 
हँसते हुए कहता हूँ ।  


मैं दर्द का पुलिंदा हूँ

तुम दरअसल जहाँ-जहाँ 
अपनी ख़ुशी ढूँढने निकलते हो 
वहाँ से हो कर लौटा हूँ कई दफ़े 
चुन लाया हूँ दुःख के कोहिनूर । 

माँ ने हाथ में थमाई थी एक गुल्लक बचपन में 
खनखनाते सिक्कों की आवाज़ 
तब्दील होती गई ख़ालीपन के शोर में । 

गुल्लक बचपन 
जवानी अलमारी 
नींद एक लड़की । 

सारा दुःख समेट लेती है और रोती भी नहीं 
गुल्लक,खनखनाती भी नहीं।

तुम कभी आओ और देखो 
छुओ नहीं 
मैं दर्द का पुलिंदा हूँ 
छुओगे तो पछताओगे ।  

Saturday, January 17, 2015

जिसे मैं धोखा कहता हूँ वो धोखा नहीं

वो नहीं जानता था ऐसा कोई भी शब्द 

प्रेम जो दिख नहीं सकता 
उसे कैसे चीरा जा सकता है 
दो भागों में 
कि लो 
तुम्हारा तुम्हारे हिस्से 
मेरा मेरे हिस्से 
इतने अरसे में हम कोई घुल थोड़े ही गए थे,
समाए कब थे एक-दूसरे में !
ना । 

जो प्रेम सिखाए,वही उसके मायने ठुकराए रोज़ 
क्या क़िस्मत !

जिसे मैं धोखा कहता हूँ वो धोखा नहीं 
ऐसा तो तब फूटता है मूँह से जब आत्मा कलपती है 
मेरे लिए मौत भली 
उसका तो सही था । 

जो दुनिया भर का सारा प्यार समेट कर चूमे घंटों बेतहाशा 
अपमानित भी करे तो क्या कलेजा मेरा जो बिखर जाऊँ । 

क्या अब भी मैं स्त्री के प्रेम को तरसूँगा 
देह के लिए तरसना क्या प्रेम नहीं होता 
अंगारे बरसेंगे 
धुलेगी आत्मा फिर । 

Thursday, January 15, 2015

कैफ़े कॉफी डे,ब्लैक फ़ॉरेस्ट और समुन्दर

बहुत सारी बातें एक साथ मुझे सोच रही थीं। जब समुन्दर मेरे सामने आ कर बैठ जाता है तो ऐसा ही होता है। उदासी बहुत सारा समुन्दर दे जाती है । 

वह बहुत पहले मुझे छोड़ कर जा चुकी थी। हमारे बीच अंडरस्टैंडिंग नहीं बन पाई थी। इसी में हमने तीन साल बिता दिए। मेरी आँखें और मेरा माथा उसे छोड़ नहीं पा रहे थे। जब समुन्दर मेरे सामने आ कर बैठ जाता था तो मुझे उसकी बहुत याद आती थी। माफ़ कीजिएगा,यह समुन्दर के बैठने वाली बात दोबारा लिख दी। माफ़ी माँगने में इसका ज़िक्र तीसरी बार भी हो गया। अगर हम अभी साथ होते तो मैं यहाँ आ कर उसे फ़ोन करता और मोबाइल को पानी के पास ले जा कर उसे लहरों की आवाज़ सुनाता। 

-नहीं आई आवाज़ !
-अब ?
-हाँ अब आई । 
-i miss you.
-i miss you too.
-मुझे यहाँ अकेले आना अच्छा नहीं लगता। 
-मुझे वहाँ आ कर तेरे साथ लहरों की आवाज़ सुननी है। 
-परेशान मत हो।कुछ समय बाद तो तू आ ही जाएगी। 
-हाँ। लेकिन तब तक तू इंतज़ार करेगा ना ?कोई और मत ढूँढ लेना। 
-मैं फँस गया हूँ तुझसे। अब कहीं नहीं जाऊँगा। 

फिर माफ़ी चाहूँगा। पुराने समय में लौट जाने की बुरी आदत है मुझे। दिमाग़ टाइम मशीन सा हो गया है। सूरज डूबने को था। सूरज डूबने का सीधा सम्बन्ध,और उदासी से है। अचानक से मुझे सब कुछ और ख़राब लगने लगा। मुझे याद आया कि अगले पाँच महीने तक तो कोई दिक्कत नहीं है,उसके बाद क्या होगा। मैं वापस घर चला जाऊँगा और दुनिया भर का साहित्य पढ़ूँगा और ईरानी,जर्मन,फ्रैंच,पोलिश,मेक्सिकन सारा सिनेमा देखूँगा। व्हाट्सऐप,फेसबुक सब बंद कर दूँगा और जैसे अभी मैं बात करने के लिए लोगों को ढूँढता रहता हूँ,तब सब मुझे ढूँढेंगे। मेरा मन किया कि पत्थरों से उतर जाऊँ और सीधा समुन्दर की ओर चलता चला जाऊँ। तभी पास से एक आवाज़ आई । 

-ग्याला 
-बाला 
-तेला  .......... 
एक छोटी सी बच्ची रेत पर उँगलियों से लकीरें खींचती हुई तुतलाती आवाज़ में गिनती बोल रही थी। 

वह बहुत प्यारी थी। मुझे लगा उसका नाम नेहा होगा। बहुत देर तक उसे देखता रहा और मुस्कुराता रहा। वह अपने दादा-दादी के साथ आई थी। दुनिया भर के दादाओं और दादियों के पास यही काम बचता है कि वे अपने बच्चों के बच्चों के साथ खूब खेलें। मुझे याद आया कि मैंने अपने दादा-दादी को नहीं देखा। मुझे घोर निराशा हुई कि इन रिश्तों को तो मैंने जीया ही नहीं। नेहा चली गई। 

मेरा फुटबॉल खेलने का मन हुआ। चूमने का भी। अँधेरा होने लगा था। उज्जवल भविष्य मेरी कामना करता हुआ वहाँ से चला आया। कैफ़े कॉफी डे के सामने से गुज़रा तो ब्लैक फ़ॉरेस्ट के एक कप में घुसी दो चम्मचें दिखने लगीं। होंठों ने उँगलियों को अपनी ओर खींचा और मैं आगे बढ़ गया । 

घंटों कमरे में बंद पड़े रहना

जो आसान था,
वही सबसे मुश्किल था 
मुश्किल था एक बार बाहर निकला जाना । 

बाहर 
ठंडी हवा थी,
कुत्ते थे,
पेट भर खाना था
बाहर दीवारें नहीं थी । 

मैं तुम्हारे साथ पड़ा रहना चाहता था 
तुम मेरे अंदर थीं । 

तुम एक छवि हो 
जो तुमने ही मेरी आँखों में बुनी है । 

पार्श्व में सुनाई देती 
"ना तुम हमें जानो,ना हम तुम्हें जानें"
की धुन 
और 
घंटों कमरे में बंद पड़े रहना ।