Monday, December 23, 2013

जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

कर तो लोगे प्रेम 
निभाओगे कैसे ?
अपने ही पहरेदार बन कर बैठ जायेंगे 
तुम्हें बंद कमरों में पीटा जायेगा 
तुम्हारी ज़ात तय करेगी तुम्हारा भविष्य 
तुम्हारी जेब का भार तय करेगा तुम्हारी इज्ज़त 
तुम्हारे परम-पूज्य पिताश्री-माताश्री 
(मुख्यतः पिताश्री,माताएं अक्सर मूक होती हैं)
तय करेंगे की तमाम उम्र 
हर रात तुम्हें किसके सोना है 
उस कमरे के बाहर भले लोगों का समाज होगा
अंदर
एक जंगल होगा
ऐसे जंगल का तिरस्कार करोगे
तो कानून भी है तुम्हारे लिए
पेड़ की टहनी पर रस्सी का एक सिरा
दूसरा दो गलों में
घुटेगा दम
हवा में निर्जीव होंगे
चार पैर ....
और यह होगा जंगल का इन्साफ ...

समाज पनप रहा है जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

Sunday, December 22, 2013

ग़र रहते हम दोस्त

तुम हमारे घर आते हम तुम्हारे घर आते
ग़र रहते हम दोस्त तो मस्ती से जी पाते


इतनी सारी बंदिशें इश्क़ साथ लाएगा
ऐसी ग़ुलामी में बोलो कब तक जी पाते
न भटकना पड़ता यूं दूसरों के दर पर
खुद से इश्क़ करने का ग़र हुनर जान पाते


एक सिरा खुद लेकर दूसरा तुम्हें थमाया था
जितनी बार तुमने गिराया काश उतनी बार उठा पाते


प्यार के गीतों से फिर आँखें नम हुई हैं
तुम्हारे पास आने की छटपटाहट उम्र भर रोक पाते


ओ रहबरों एक बस्ती दिलजलों की बसा देते
भूल अपना "मैं" सब इश्क़ के किस्से सुना पाते


Friday, December 20, 2013

मैं रेगिस्तान में मरूँगा

जब लौट कर जाना ऐसा हो जायेगा
जैसा वर्जित होना होता है
जैसे घर हो जाते हैं
माँ वहीँ रहती है
जैसे प्रेमी हो जाते हैं
हर बात पे झगड़े के बाद या  
लम्बी चुप्पी के बाद
अगर तब लौटे ?
कायरता और धैर्य को
एक तराजू में तौला जायेगा क्या ?
प्यार और कमज़ोरी को भी ?
समझ धोखा दे ही देती है
कोई पीछे भागता है
कोई स्थिति से
अगर है कुछ मन में
तो झाँका जाना चाहिए मन में
इतने प्यारे लोग निर्दयी क्या सच में होते हैं ?
अनकही बातों का अपराध-बोध
मुझे भी छीलता है
कसौटी पर मुझे खरा उतरना था
तुम्हें क्यों नहीं ?
तुमने भी किया था
तुम्हें भी मारेगा ...

और मैंने अपने मरने की जगह
चुन ली है
मैं मरूँगा वहाँ जहां
आस होगी
प्यास होगी
रेत होगी
जहां रेगिस्तान होगा
हाँ मैं रेगिस्तान में मरूँगा
सुनो
किसी एक साल तुम्हें झमाझम बरसना होगा

लोग कहते हैं
रेगिस्तान में बारिश नहीं होती |

Saturday, December 14, 2013

हारो मत

आओ,देखो
मेरे पास बैठो
देखो मुझे
मेरे चेहरे को
मेरी आँखों को
पहचानो
मेरी आस को
मेरी प्यास को
तुम्हारे पास ही हल है
झंझटों से ऊपर उठो
यह आज हैं कल नहीं रहेंगी
सब कुछ हमारे ही हाथ में है
समय कहीं निकल न जाए
मैं मर न जाऊं
किस फेरे में पड़ी हो
क्या सोच रही हो
सही-ग़लत
खोया-पाया
मिला-किया
यह आंकलन कहीं तो जाके रुके
दिल,मन ,एहसास ,प्यार सब मायने रखता है
इंसान भी तो मायने रखता है
जीवन भी तो मायने रखता है
लड़ो सही बात के लिए
हारो मत

मत हारो ।

Wednesday, December 11, 2013

त्याग-पत्र



मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार-बार कि
प्रेम साहस बन सके
लम्बे अरसे से बंद
किवाड़ें खुल सकें

खुल कर जीना
और प्रेम में खुल कर जीना
यह दोनों बातें अलग क्यों हैं ?कैसे हैं ?
कौन हैं यह लोग जो
यह अंतर पैदा करते हैं ? क्यों ?
निर्मम और निर्दयी
यही शब्द याद आते हैं

प्रेम के नाम पर दुनिया चलाने वाले
दुनिया में प्रेम नहीं चलने देते

उचित समय और समझ की दुहाई
हमें मत दीजिये
कोई कुछ सीख कर नहीं आता
अपने खुद के गढ़े सुख,दुःख और अनुभव से
गुजरने की इच्छा क्या ग़लत है ?
हाँ तुम आज़ाद हो
लेकिन हम नहीं हैं
"मैं" और "तुम" एक ही है
लेकिन "हम" अलग है

क्या एहसासों को समय-सीमा में बाँधा जा सकता है ?
क्या कोई काल निश्चित किया जा सकता है प्रेम के लिए ?
क्या यादों और ख्यालों को मस्तिष्क के किसी कोने में
बंद किया जा सकता है ?

अचार,कम्बल,कुर्ते,चाय,खाना
पत्र,आँसू,लड़ाई,भरोसा और इंतज़ार
यह सब वापस लौटाया जा सकता है ?

सुख दुःख होता जा रहा है 

मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार बार
कितना अरसा हो गया
तुमसे एक किवाड़ नहीं लांघी जाती

यह अपमान है
मेरा नहीं प्रेम का

सुना है लोग प्रेम-पत्र लिखते हैं
यह भी प्रेम में लिखा गया "प्रेम-पत्र" ही है
स्थिति को समझा जाए और बार बार पढ़ा जाए
तो त्याग-पत्र सा लगता है | 

Thursday, December 05, 2013

हम जी लेंगे सवालों के साथ

बस अब यह जुबां न खुले
और कोई आरज़ू न पले

बेहतर है अब चुप ही रहें
रिश्तों में और गिरहें न डलें

हमारा ज़ेहन है हमारे ख्याल हैं
यह लड़ते रहें आप फूले-फलें

हम जी लेंगे सवालों के साथ
जवाबों की तलाश में कितना जलें

यह न लिखता ग़र मिल जाते
यह दूरी अब और खले 

Wednesday, December 04, 2013

मुद्दों से यह कोसो दूर हैं

चर्चा का बाज़ार गरम है
आज का दिन अपना करम है

पांच साल बाद निकले हैं वह
देखो इनमे कितनी शरम है

हमें लगेगा दम है हम में
समय बोलेगा कितना भरम है

मुद्दों से यह कोसो दूर हैं
राजनीति ही इनका धरम है

पैसे और लाशों का खेल है
देखो आका आज नरम हैं