मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार-बार कि
प्रेम साहस बन सके
लम्बे अरसे से बंद
किवाड़ें खुल सकें
खुल कर जीना
और प्रेम में खुल कर जीना
यह दोनों बातें अलग क्यों हैं ?कैसे हैं ?
कौन हैं यह लोग जो
यह अंतर पैदा करते हैं ? क्यों ?
निर्मम और निर्दयी
यही शब्द याद आते हैं
प्रेम के नाम पर दुनिया चलाने वाले
दुनिया में प्रेम नहीं चलने देते
उचित समय और समझ की दुहाई
हमें मत दीजिये
कोई कुछ सीख कर नहीं आता
अपने खुद के गढ़े सुख,दुःख और अनुभव से
गुजरने की इच्छा क्या ग़लत है ?
हाँ तुम आज़ाद हो
लेकिन हम नहीं हैं
"मैं" और "तुम" एक ही है
लेकिन "हम" अलग है
क्या एहसासों को समय-सीमा में बाँधा जा सकता है ?
क्या कोई काल निश्चित किया जा सकता है प्रेम के लिए ?
क्या यादों और ख्यालों को मस्तिष्क के किसी कोने में
बंद किया जा सकता है ?
अचार,कम्बल,कुर्ते,चाय,खाना
पत्र,आँसू,लड़ाई,भरोसा और इंतज़ार
यह सब वापस लौटाया जा सकता है ?
सुख दुःख होता जा रहा है
मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार बार
कितना अरसा हो गया
तुमसे एक किवाड़ नहीं लांघी जाती
यह अपमान है
मेरा नहीं प्रेम का
सुना है लोग प्रेम-पत्र लिखते हैं
यह भी प्रेम में लिखा गया "प्रेम-पत्र" ही है
स्थिति को समझा जाए और बार बार पढ़ा जाए
तो त्याग-पत्र सा लगता है |