Wednesday, December 11, 2013

त्याग-पत्र



मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार-बार कि
प्रेम साहस बन सके
लम्बे अरसे से बंद
किवाड़ें खुल सकें

खुल कर जीना
और प्रेम में खुल कर जीना
यह दोनों बातें अलग क्यों हैं ?कैसे हैं ?
कौन हैं यह लोग जो
यह अंतर पैदा करते हैं ? क्यों ?
निर्मम और निर्दयी
यही शब्द याद आते हैं

प्रेम के नाम पर दुनिया चलाने वाले
दुनिया में प्रेम नहीं चलने देते

उचित समय और समझ की दुहाई
हमें मत दीजिये
कोई कुछ सीख कर नहीं आता
अपने खुद के गढ़े सुख,दुःख और अनुभव से
गुजरने की इच्छा क्या ग़लत है ?
हाँ तुम आज़ाद हो
लेकिन हम नहीं हैं
"मैं" और "तुम" एक ही है
लेकिन "हम" अलग है

क्या एहसासों को समय-सीमा में बाँधा जा सकता है ?
क्या कोई काल निश्चित किया जा सकता है प्रेम के लिए ?
क्या यादों और ख्यालों को मस्तिष्क के किसी कोने में
बंद किया जा सकता है ?

अचार,कम्बल,कुर्ते,चाय,खाना
पत्र,आँसू,लड़ाई,भरोसा और इंतज़ार
यह सब वापस लौटाया जा सकता है ?

सुख दुःख होता जा रहा है 

मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार बार
कितना अरसा हो गया
तुमसे एक किवाड़ नहीं लांघी जाती

यह अपमान है
मेरा नहीं प्रेम का

सुना है लोग प्रेम-पत्र लिखते हैं
यह भी प्रेम में लिखा गया "प्रेम-पत्र" ही है
स्थिति को समझा जाए और बार बार पढ़ा जाए
तो त्याग-पत्र सा लगता है | 

Thursday, December 05, 2013

हम जी लेंगे सवालों के साथ

बस अब यह जुबां न खुले
और कोई आरज़ू न पले

बेहतर है अब चुप ही रहें
रिश्तों में और गिरहें न डलें

हमारा ज़ेहन है हमारे ख्याल हैं
यह लड़ते रहें आप फूले-फलें

हम जी लेंगे सवालों के साथ
जवाबों की तलाश में कितना जलें

यह न लिखता ग़र मिल जाते
यह दूरी अब और खले 

Wednesday, December 04, 2013

मुद्दों से यह कोसो दूर हैं

चर्चा का बाज़ार गरम है
आज का दिन अपना करम है

पांच साल बाद निकले हैं वह
देखो इनमे कितनी शरम है

हमें लगेगा दम है हम में
समय बोलेगा कितना भरम है

मुद्दों से यह कोसो दूर हैं
राजनीति ही इनका धरम है

पैसे और लाशों का खेल है
देखो आका आज नरम हैं 

ग़म-ए-हिज्र कभी

ग़म-ए-हिज्र कभी तुमको भी हुआ होता
जो हुआ हमारा हाल तुम्हारा भी हुआ होता

घर,मोहल्ला,समाज है और रहेंगे
थोड़ा निडर तुम्हारा प्यार भी हुआ होता

सब समझदार कहते हैं तुमको बहुत
समझ का थोडा हिस्सा मेरा भी हुआ होता

इश्क़ में जितना हुआ है हमारा नुकसान
थोड़ा सा तो तुम्हारा भी हुआ होता 

Saturday, November 30, 2013

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे

गहरे हैं ज़ख्म वक़्त तो लगेगा भरने में
जी लिए हैं बहुत अब लम्हा लगेगा मरने में

बेहतर था एक गोली में जान निकल जाती
सदियाँ लगेंगी इस तरह की मौत से उबरने में

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे
नहीं बनती तो छोड़ो यार क्या रखा है डरने में

हम नहीं हारे हैं जीती है ज़ात इंसान की
कहते तो थे तुमको "वो" क्या रखा है इश्क करने में ...

बच्चे मर गए

ख़त्म हुआ अब
कब तक टालें

ज़हर के प्याले
सब मेरे हवाले

लानत दुनिया
मुझ पे डाले

लाल पड़ गए
सब नदिया-नाले

सब हँस के बोले
जा जी ले साले

बच्चे मर गए
खुश हैं घरवाले 

Tuesday, November 26, 2013

कोई इस जगह का नाम बता दे

तुच्छ मैं था नहीं
चुप था
प्रतीक्षा में
अब मुझे लगता है
मानवता के इतिहास में खुद पर
किया जाने वाला सबसे बड़ा ज़ुल्म है
प्रतीक्षा करना

जब आप हँस सकते थे छोटी-छोटी बातों पर
खेल सकते थे घर के छोटे बच्चों के साथ
बना सकते थे माँ के साथ खाना
कर सकते थे बहुत सारे रचनात्मक कार्य
आप प्रतीक्षा में थे
घूम सकते थे अकेले भी
पहाड़ियों पर,बर्फ में,बारिशों में
जला सकते थे दीपक
लगा सकते थे नए पौधे
आप प्रतीक्षा में थे
बांधे जा सकते थे अकेले भी
मन्नत के धागे
पर एक पागलपन लिए थे

और समाज के आगे होना था
नतमस्तक
वही देता था स्वीकृति

न अंदर जाने की इजाज़त
न मुड़कर जाने की हिम्मत
कब तक और कैसे
खड़ा रहे कोई
खुले दरवाज़े पर
कोई इस जगह का नाम बता दे
जहां खड़ा हूँ मैं
यहाँ से कहाँ जाया जाता है ?