Wednesday, June 27, 2012

सफ़र

आज इस रात 
जब मैं डरता हूँ 
कि तुम्हारे आस-पास 
सब ठीक है या नहीं 
तुमने कम्बल ठीक से 
ओढा है या नहीं 
तुम्हे ठंड तो नहीं लग रही 
मेरे बारे में सोच कर 
तुम ज्यादा परेशान तो नहीं 
मेरे तुम्हारे पास न होने की वजह से 
वो कचौड़ियाँ तुम्हारे गले से उतरी हैं या नहीं ।
वहीँ 
तुम भी शायद डरती होगी 
मुझे लेकर 
इन्ही सब बातों के लिए।
मैंने ठीक से पहने हैं कपड़े 
ओढ़ लिया है तुम्हारा दिया कम्बल भी ।
बीत रही है 
यह रात 
यहाँ तुम्हारे बिन ।
बीत रही है 
यह रात 
वहाँ मेरे बिन ।
सुबह ही दे पायेगी 
इस रात का जवाब ।
वैसे भी 
सुबह ही देती है 
हमेशा 
रात का जवाब ।

Friday, June 22, 2012

सोचने की बात है ....


घर 
गली 
चौराहे 
सरहद 
लोग मर रहे हैं 
किस को महसूस होता है 
एक संसद है 
बहुत सारे नेता हैं 
उन्हें तो 
पता भी नहीं चलता 
या 
पता करना नहीं चाहते ? 
या 
सब पता होता है ?
हंसी मज़ाक करते हैं 
नोट दिखाते हैं 
जूते भी 
फिर दोस्त बन जाते हैं 
जवाब तक नहीं देते 
गुस्सा आता है 
पर गुस्से से काम नहीं बनता 
तब कैसे बनता है ?
सोचने की बात है 
क्या हो रहा है ?

Thursday, June 21, 2012

इंसान 


रात का समय 
एक सड़क 
बहुत सी गाड़ियां 
मस्ती में 
दौड़कर 
सड़क पार करते 
घर को जाते  
कुछ लड़के 
गुज़रती गाड़ियों के 
शोर में 
सड़क किनारे 
बिना बिस्तर के 
कुत्तों के साथ सोते 
"इंसान"

Wednesday, June 20, 2012

माँ 


भारी बारिश में 
रोज़ की व्यस्तता दिमाग में लिए 
घर पहुँचने की जल्दी में 
कदम तेज़ी से बढ़ रहे थे 
कि रास्ते में 
एक गली में 
एक घर से आती 
पराँठों कि खुशबू 
माँ की याद दिला गयी 
जो व्यस्तता के कारण 
कहीं दिल के किसी कोने में 
दब गयी थी 
खाने का वो स्वाद
याद आते ही 
मूंह में पानी तो आया 
पर अब तो मैं
वो स्वाद भी 
भूल चुका हूँ

Monday, June 18, 2012

तकलीफ 

तकलीफ होती है तसव्वरे-जानां से भी 
जिंदगी से तो चले गए दिल से भी चले जाते ....

Sunday, June 17, 2012

पापा

 

 


जब चलना सिखाया था तुने 
तब कहाँ पता था 
तू यूं चला जायेगा 
जब कंधे पर बिठाकर 
यह दुनिया दिखाई थी 
तब कहाँ एहसास था 
तेरे बिना भी जीना आ जायेगा 
तेरा साया मेरी जन्नत था बाबा 
अब तू खुद जन्नत में है 
आँखों से अश्क बहते तो हैं
पर  फिर सोचता हूँ 
तू  ऊपर से देखता होगा ......

Saturday, June 16, 2012


जो  गया .......

बातें अगर होती 
तो गलतफहमियां मिट भी सकती थी
हाथों में हाथ अगर होता
 तो मंजिलें मिल भी सकती थी 
यह जानते थे 
आप भी
 हम भी 
कि कहीं तो कमी है 
कुछ आप में समझ कि कमी थी 
कुछ हम में समझ कि कमी थी