मैंने सीखा था प्रेम में होना
अब मैं सीख रहा हूँ
प्रेम में ना होना |
मैं चुन रहा हूँ उन पलों को
जो याद रखने हैं
जिनमें तुम निष्ठुर थीं
भुला रहा हूँ वह समय
जो जोंक की तरह चिपक गया है
मेरे माथे से
जो घुस गया है मेरी आँखों में
जिनमें तुम और मैं थे
मैं अंतर नहीं कर पा रहा हूँ |
पलट कर यूँ ही तुमसे कुछ पूछ
लेने का मन करता है
फिर याद आ जाता है
अब सिर्फ मैं ही हूँ
तभी यहाँ किसी सड़क पे
दिख जाता है पान का खोखा
मैं खा लेता हूँ एक मीठा पान
पर अब पहले की तरह उगल नहीं देता
निगल लेता हूँ
स्वाद कभी वैसा नहीं होता
कभी खुद ही अपनी आँखों में लगा लेता हूँ काजल
और देख लेता हूँ दोनों को आईने में
चाँद जो तुमने देखना सिखाया था
उम्र भर अकेले ही देखना होगा
यह टीस मुझे फिर लौटा लाती है
जहाँ से मैं रोज़ थोड़ा भागना चाहता हूँ |
अब तुम कुछ भी मेरे लिए नहीं करती
काश थोड़ी ग़लतफहमी तो मेरे हिस्से
छोड़ दी होती
प्रेम कितना दूर ले आया है
तुम्हें नहीं मुझे
जानता हूँ
तुम इस तरह नहीं सोच पाओगी ।