Tuesday, May 13, 2014

छोटी सी ही तो बात है


तूने कलाईयों के कंगन बदले हैं शायद
     आँखों का काजल पोंछा है शायद
     या आँखें ही बदल ली होंगीं
     तूने तारीखें बदली हैँ  
     कानों में पड़ने वाली आवाज़ बदली है
     बिस्तर की वो सिलवटें बदली हैं
     या वो चादरें फूँक दी होँगी
     
     बहुत शौक है न तुझे
     सिरे से नकार देने का
     प्रेम को
     तीन वर्षों को
     फाड़ कर फ़ेंक देने का उन तोहफों को
     जिनको कभी सीने से लगाये फिरती थी
     और नाज़ करती थी प्रेम पर
     सिर्फ लगाव भर नहीं था
     घरेलू संस्कार ?
     
     …………
     चुभने वाला सच कहूँ ?
     छोटी सी ही तो बात है
     तूने लड़का बदल लिया है ।  

Wednesday, April 02, 2014

मैं खा लेता हूँ एक मीठा पान

मैंने सीखा था प्रेम में होना
     अब मैं सीख रहा हूँ
     प्रेम में ना होना |
     मैं चुन रहा हूँ उन पलों को
     जो याद रखने हैं
     जिनमें तुम निष्ठुर थीं
     भुला रहा हूँ वह समय
     जो जोंक की तरह चिपक गया है
     मेरे माथे से
     जो घुस गया है मेरी आँखों में
     जिनमें तुम और मैं थे
     मैं अंतर नहीं कर पा रहा हूँ |

     पलट कर यूँ ही तुमसे कुछ पूछ
     लेने का मन करता है
     फिर याद आ जाता है
     अब सिर्फ मैं ही हूँ
     तभी यहाँ किसी सड़क पे
     दिख जाता है पान का खोखा
     मैं खा लेता हूँ एक मीठा  पान
     पर अब पहले की तरह उगल नहीं देता
     निगल लेता हूँ
     स्वाद कभी वैसा नहीं होता
     कभी खुद ही अपनी आँखों में लगा लेता हूँ काजल
     और देख लेता हूँ दोनों को आईने में
     चाँद जो तुमने देखना सिखाया था
     उम्र भर अकेले ही देखना होगा
     यह टीस मुझे फिर लौटा लाती है
     जहाँ से मैं रोज़ थोड़ा भागना चाहता हूँ |

     अब तुम कुछ भी मेरे लिए नहीं करती
     काश थोड़ी ग़लतफहमी तो मेरे हिस्से
     छोड़ दी होती    
     प्रेम कितना दूर ले आया है
     तुम्हें नहीं मुझे
     जानता हूँ
     तुम इस तरह नहीं सोच पाओगी ।  
              

      

Tuesday, April 01, 2014

मैं किरकिरी ही सही चुभता रहूँगा उम्र भर


कब तक ज़ुबाँ को सलीके में रखा जाए 
जो हुआ उसे धोखा मान ही लिया जाए

बहुत अरसा हुआ आज नाराज़गी पनपी है

मैंने ही पाले थे भरम मान ही लिया जाए
         
मैं किरकिरी ही सही चुभता रहूँगा उम्र भर
तेरी आँखों से कोई और बहेगा मान ही लिया जाए


चाहा था समझते रहें एक-दूसरे को हमेशा
तूने समझ ली है दुनिया मान ही लिया जाए

Saturday, March 22, 2014

कल किसी और के लिए

लिखे हुए शब्द
   बोली गयीं बातें
   जिन पलों का कोई साक्षी नहीं होता
   ऐसे बिताये हुए पल
   मौन और स्थिर तस्वीरें
   बहुत सारे पैदल रास्ते
   बहुत कुछ बचाने को
   रोज़ रोज़ किया हुआ
   ज़रा ज़रा सा संघर्ष
   और भी तो
   कितना कुछ
   सब व्यर्थ है
   अर्थ है तो सिर्फ
   एक ख़ूबसूरत एहसास का
   जिसकी नियति है
   बदलते जाना
   आज किसी के लिए
   कल किसी और के लिए
   परसों शायद…….

Thursday, March 20, 2014

एकतरफा फैसलों की वजह से

हम तलाश रहे थे अपना भविष्य
हमारे भी थे घर
हमारी भी थी माँ

दो लोग अगर अपना भविष्य
अपने सपने
साथ में देखते हैं
तो क्या ग़लत करते हैं ?

यह कैसे रिश्ते थे?

कभी हमें बुलाया जा रहा था
कभी हम मांग रहे थे थोड़ा सा समय
और किस से?
जीवन भर साथ रहने की बात करने वाली लड़कियाँ
तय कर रही थी हमारा भविष्य
सुना रही थी फ़ैसले
सहारा लिया जा रहा था
नारीवाद और आज़ादी जैसे शब्दों का

और हम नम आँखें लिए नाप रहे थे सड़कें
लौट रहे थे घर
एक एक करके सालों में संजोये
हर छोटे-छोटे पल में घुसे
हज़ारों सपने टूट रहे थे
बह रहे थे

हाँ हमें लौटाया जा रहा था
हमारे प्यार को दुत्कारा जा रहा था
हमसे झूठ बोले जा रहे थे
मगर हम इतने बेवकूफ थे कि
हमारी आँखों से उनका चेहरा नहीं उतर रहा था
उम्मीद नहीं जा रही थी

मैं कहता हूँ
हम सब को ऐसी हर उम्मीद को दफ्न करना चाहिए अब

सिर्फ एक एहसास के ख़त्म होने से
अगर सब ख़त्म हो जाता है
और कुछ मायने नहीं रखता
तो ऐसे एहसास का पूछा जाना चाहिए मतलब

होनी चाहिए भरपाई हमारे जीवन में आई
उथल पुथल की
ऐसे एकतरफा फैसलों की वजह से

और कितने ख़ूबसूरत चेहरे
यूँ जानवर बन जायेंगे |


Monday, February 24, 2014

किसी को अपने से अलग होने के लिए कहना

तुम आना
जब मैं भूल जाऊँगा इस दुनिया को  
मेरी उंगली पकड़ कर
मुझे ले जाना वापस
लोगों के बीच


जहां हर बड़ा आदमी
दूसरे बड़े आदमी को जानता है


जहां लोग बड़े बड़े फ़ैसले
झट से ले लेते हैं
देख पाते हैं अपना जीवन
साफ़-सुथरा दूर तलक


जहां तोड़ दिया जाता है
उन रिश्तों को
जिनका कोई नाम नहीं होता
जिनमे रहने के लिए कोई बाध्य नहीं होता
पर अलग होने के लिए होता है


किसी को अपने साथ रहने के लिए कहना
ज़बरदस्ती तो होती है
पर किसी को अपने से अलग होने के लिए कहना
कोई ज़बरदस्ती नहीं होती


और आपको चुपचाप ख़ामोशी से
बिना किसी तमाशे के
बस मान लेना होता है
क्योंकि ऐसे में भी निभाना होता है प्यार
उससे जो कह चुका है
कि उसे प्यार था अब नहीं है


कहाँ से सीखा तुमने 
किसी को यूं आत्मा में बसा लेना 
और केंचुल की तरह उतार फेंकना ।

Tuesday, February 04, 2014

वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी

जब बातें शुरू होने से पहले
ख़त्म होने लगी थीं
और सब कुछ भूल कर
लड़खड़ाते हाथों से भी लिखना था
कैसा होता है नकली होते चले जाना
कैसा होता होगा असली रूप में लौटना
और हर निर्णय मजबूरी रहा हो |

“उम्मीद” जितना घातक शब्द है
उतना ही सुंदर भी
और अगर याचना ही अंत है
तो तुमसे क्यों नहीं ?
मेरे पेट में ख़ंजर भोंका गया था
और मैं समझने की कोशिश में था
मुझे लाल रंग नहीं दिखा
आईना दिखा और दो चेहरे
मेरी आँखें बुझती गयीं
चेहरे चूमते रहे एक दूसरे को
इन चेहरों में झुर्रियां पड़नी थीं साथ-साथ
और हमें अतीत में भी जाना था
वही ख़ंजर पलट के मार देना था
पर मैं समझने की कोशिश में था
और वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी |